Thursday, February 18, 2010

जीत गया टेस्ट क्रिकेट...

चन्द्र कान्त शुक्ला
बादशाहत की जंग, टेस्ट क्रिकेट का वर्ल्ड कप आदि अनेक नाम दिए गए थे भारत-द. अफ्रीका टेस्ट सीरीज को। देश के सबसे बड़े स्टेडियम में सीरीज के दूसरे और अंतिम टेस्ट के अंतिम दिन गुरुवार को इस खेल के रोमांच ने साबित भी कर दिया कि वाकई इस सीरीज को दिए गए उक्त नामों में कोई अतिशयोक्ति नहीं थी। इस सीरीज से टेस्ट क्रिकेट की अंतरराष्टÑीय रैंकिंग में नम्बर वन टीम का फैसला तो होना ही था पर मेरा मानना है कि टेस्ट क्रिकेट के भविष्य का फैसला भी हो गया। फटाफट क्रिकेट, रोचक क्रिकेट, बीसमबीस के इस दौर में भी टेस्ट मैच देखने के लिए जब ईडन गार्डन लगभग भर जाए तो इसे मैं टेस्ट क्रिकेट की जीत ही कहूंगा। वर्ना तो संगठन वाले ठाने बैठे हैं कि कब दर्शकों की संख्या घटे और हम इसकी आड़ में क्रिकेट के इस संस्करण को बंद कर दें। वर्तमान में खेल रहे लगभग सभी खिलाड़ी टेस्ट क्रिकेट को ही असली क्रिकेट, खिलाड़ी की असली परीक्षा लेने वाला संस्करण मानते हैं, पर संगठन के कमाई वाले फारमेट से इसका तालमेल ज्यादा दिनों तक शायद ही बैठ पाए। अब यह तो खिलाड़ियों के हाथ में ही है कि वे अपने इस पसंदीदा संस्करण को कितने दिनों तक बचाए रख पाते हैं। वो तो देश भर के क्रिकेट प्रेमियों का दबाव था जो द। अफ्रीका के खिलाफ इस सीरीज में बीसीसीआई को दो टेस्ट मैच जुड़वाने पड़े वर्ना मेहमान तो सिर्फ पांच वनडे मैचों की सीरीज खेलने ही आ रहे थे। बीते और वर्तमान सत्र में भारतीय टीम का जो कार्यक्रम तय हुआ था उसके मुताबिक तो यह लगने लगा था कि बीसीसीआई का टेस्ट क्रिकेट से मोहभंग हो गया है। बादशाहत के बहाने ही सही अभी कुछ और सालों के लिए तो टेस्ट क्रिकेट को जीवित रखने की नींव इस सीरीज ने रख ही दी है।
अमला के हौसले को सलाम
तीन पारियां, एक दोहरा शतक, दो शतक... उस पर भी दो बार नाबाद... है न कमाल का प्रदर्शन। फटाफट क्रिकेट से प्रभवित इस दौर में टेस्ट भी कम से कम वनडे मैचों की तरह तो खेला जाने ही लगा है। चार रन, पांच रन प्रति ओवर की औसत से रन बन रहे हैं। 95 फीसदी मैचों के नतीजे आने लगे हैं, ऐसे दौर में घुमावदार भारतीय पिचों पर 12-14 घंटे बल्लेबाजी करना वाकई बड़े हौसले का काम है। ऐसा हाशिम अमला ने एक बार ही नहीं बल्कि दो टेस्ट मैचों की तीनों पारियों में कर दिखाया। उनके इस प्रदर्शन को दोनों मैचों में मैन आफ द मैच और मैन आफ द सीरीज से नवाजा जाना उनकी प्रतिभा का वास्तविक सम्मान है।
पहली बार हौसला टूटता दिखा मिस्टर कूल का
हर परिस्थिति में धीर गंभीर बने रहने और हौसला न खोने के चलते मि. कूल कहे जाने वाले भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी का हौसला भी गुरुवार को उस वक्त टूटता दिखा जब अंगद की तरह पांव जमाए खड़े हाशिम अमला का साथ ग्यारहवें नम्बर का खिलाड़ी मोर्न मोर्केल घंटे भर तक निभा गया। धोनी ने अपने हर अस्त्र का इस्तेमाल करके देख लिया, यहां तक कि सीरीज में पहली बार सचिन से भी गेंदबाजी करा ली किंतु नतीजा सिफर ही रहा। वह तो भला हो सूर्य देव का जिन्होंने बखूबी साथ निभा दिया वर्ना कहीं पहले तीन दिनों की भांति वक्त से पहले ही अस्ताचल गामी हो गए होते तो फिर धरा रह जाता बादशाहत बरकरार रखने का सपना।

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