Saturday, February 27, 2010

अब तो एकदिनी क्रिकेट से बंधे रहेंगे दर्शक

संदर्भ-वनडे में सचिन का दोहरा शतक
चन्द्र कान्त शुक्ला
भारत ही क्या अब तो पूरी दुनिया में खुद को क्रिकेट का भगवान साबित कर चुके मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने द. अफ्रीका जैसे मजबूत प्रतिद्वंदी के खिलाफ पचास ओवरों के क्रिकेट में दोहरा शतक जमाकर खेल के इस संस्करण के साथ दर्शकों को बांधे रखने का भी काम किया है। वरना क्रिकेट खेलने वाले कई देश तो पचास ओवरों के क्रिकेट से मुंह मोड़ने लगे थे। इंग्लैंड ने तो अपने घरेलू क्रिकेट के फारमेट से इसे विदाई दे ही दी है। आस्ट्रेलिया में भी पूरे सत्र भर ट्वंटी-ट्वंटी क्रिकेट खेला जाने लगा है। क्रिकेट को दुनिया के अन्य देशों में लोकप्रिय बनाने के लिए आईसीसी ने कम ओवरों के मैच, रिटायरमेंट ले चुके या टीम से बाहर चल रहे नामी खिलाड़ियों को भेजकर उन देशों में खेलने की शुरुआत की थी वह उसी के लिए जी का जंजाल बनता दिख रहा था। क्रिकेट का खेल आईसीसी के इन प्रयासों से दुनिया के कई देशों में लोकप्रिय तो हुआ पर ऐसे कम ओवरों वाले मैच क्रिकेट के बड़े खिलाड़ियों वाले देशों में भी तेजी से लोकप्रिय होते चले गए। ट्वंटी-ट्वंटी वर्ल्ड कप के तुरंत बाद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने आईपीएल के नाम से जो लीग शुरू करने की घोषणा की उसने तो आईसीसी के होश ही उड़ा दिए। पर चूंकि मामला दुनिया के सबसे धनी क्रिकेट संगठन का था आईसीसी के पास भी कसमसाकर चुप बैठने के अलावा कोई चारा नहीं था। आईसीसी को इतना बेबस मैंने अपनी याद में कभी नहीं देखा था। आईपीएल का तीसरा संस्करण फिर कुछ ही दिनों बाद शुरू होने जा रहा है। इसके लिए बनी आठ टीमों में से एक के कप्तान सचिन तेंदुलकर हैं। पिछले दो संस्करणों में उनकी टीम मुम्बई इंडियन्स कुछ खास नहीं कर पाई है, और इस बात के लिए सचिन को आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा था। सचिन ने इस फारमेट के लिए बनी देश की टीम से खुद को अलग कर ट्वंटी-ट्वंटी के प्रति अपनी अनिच्छा भी जाहिर कर दी थी। टेस्ट क्रिकेट में एक भी तिहरा शतक नहीं लगा पाने को लेकर कुछ आलोचक उनके सर्वकालिक महान बल्लेबाज होने को लेकर उंगलियां उठाते रहे हैं, ऐसे में क्रिकेट का जो संस्करण सचिन को सबसे ज्यादा भाता है उसमें सर्वकालिक महान बल्लेबाज कहलाने का मौका उनके पास था जो दोहरा शतक जड़कर सचिन ने पा लिया है। इस उपलब्धि के बाद समकालीन और पूर्व क्रिकेटरों समेत समीक्षकों की प्रतिक्रियाएं भी सचिन के लिए उत्साहवर्धक हैं, जो उन्हे क्रिकेट में और कुछ नया कर दिखाने को प्रेरित करेंगी। दोहरा शतक ठोंककर सचिन ने यह तो साबित कर ही दिया है कि उनमें अभी काफी क्रिकेट बाकी है। हम भी दुआ करते हैं कि अपने बेटे अर्जुन के तैयार होते तक सचिन देश के लिए क्रिकेट खेलते रहें।

Thursday, February 18, 2010

जीत गया टेस्ट क्रिकेट...

चन्द्र कान्त शुक्ला
बादशाहत की जंग, टेस्ट क्रिकेट का वर्ल्ड कप आदि अनेक नाम दिए गए थे भारत-द. अफ्रीका टेस्ट सीरीज को। देश के सबसे बड़े स्टेडियम में सीरीज के दूसरे और अंतिम टेस्ट के अंतिम दिन गुरुवार को इस खेल के रोमांच ने साबित भी कर दिया कि वाकई इस सीरीज को दिए गए उक्त नामों में कोई अतिशयोक्ति नहीं थी। इस सीरीज से टेस्ट क्रिकेट की अंतरराष्टÑीय रैंकिंग में नम्बर वन टीम का फैसला तो होना ही था पर मेरा मानना है कि टेस्ट क्रिकेट के भविष्य का फैसला भी हो गया। फटाफट क्रिकेट, रोचक क्रिकेट, बीसमबीस के इस दौर में भी टेस्ट मैच देखने के लिए जब ईडन गार्डन लगभग भर जाए तो इसे मैं टेस्ट क्रिकेट की जीत ही कहूंगा। वर्ना तो संगठन वाले ठाने बैठे हैं कि कब दर्शकों की संख्या घटे और हम इसकी आड़ में क्रिकेट के इस संस्करण को बंद कर दें। वर्तमान में खेल रहे लगभग सभी खिलाड़ी टेस्ट क्रिकेट को ही असली क्रिकेट, खिलाड़ी की असली परीक्षा लेने वाला संस्करण मानते हैं, पर संगठन के कमाई वाले फारमेट से इसका तालमेल ज्यादा दिनों तक शायद ही बैठ पाए। अब यह तो खिलाड़ियों के हाथ में ही है कि वे अपने इस पसंदीदा संस्करण को कितने दिनों तक बचाए रख पाते हैं। वो तो देश भर के क्रिकेट प्रेमियों का दबाव था जो द। अफ्रीका के खिलाफ इस सीरीज में बीसीसीआई को दो टेस्ट मैच जुड़वाने पड़े वर्ना मेहमान तो सिर्फ पांच वनडे मैचों की सीरीज खेलने ही आ रहे थे। बीते और वर्तमान सत्र में भारतीय टीम का जो कार्यक्रम तय हुआ था उसके मुताबिक तो यह लगने लगा था कि बीसीसीआई का टेस्ट क्रिकेट से मोहभंग हो गया है। बादशाहत के बहाने ही सही अभी कुछ और सालों के लिए तो टेस्ट क्रिकेट को जीवित रखने की नींव इस सीरीज ने रख ही दी है।
अमला के हौसले को सलाम
तीन पारियां, एक दोहरा शतक, दो शतक... उस पर भी दो बार नाबाद... है न कमाल का प्रदर्शन। फटाफट क्रिकेट से प्रभवित इस दौर में टेस्ट भी कम से कम वनडे मैचों की तरह तो खेला जाने ही लगा है। चार रन, पांच रन प्रति ओवर की औसत से रन बन रहे हैं। 95 फीसदी मैचों के नतीजे आने लगे हैं, ऐसे दौर में घुमावदार भारतीय पिचों पर 12-14 घंटे बल्लेबाजी करना वाकई बड़े हौसले का काम है। ऐसा हाशिम अमला ने एक बार ही नहीं बल्कि दो टेस्ट मैचों की तीनों पारियों में कर दिखाया। उनके इस प्रदर्शन को दोनों मैचों में मैन आफ द मैच और मैन आफ द सीरीज से नवाजा जाना उनकी प्रतिभा का वास्तविक सम्मान है।
पहली बार हौसला टूटता दिखा मिस्टर कूल का
हर परिस्थिति में धीर गंभीर बने रहने और हौसला न खोने के चलते मि. कूल कहे जाने वाले भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी का हौसला भी गुरुवार को उस वक्त टूटता दिखा जब अंगद की तरह पांव जमाए खड़े हाशिम अमला का साथ ग्यारहवें नम्बर का खिलाड़ी मोर्न मोर्केल घंटे भर तक निभा गया। धोनी ने अपने हर अस्त्र का इस्तेमाल करके देख लिया, यहां तक कि सीरीज में पहली बार सचिन से भी गेंदबाजी करा ली किंतु नतीजा सिफर ही रहा। वह तो भला हो सूर्य देव का जिन्होंने बखूबी साथ निभा दिया वर्ना कहीं पहले तीन दिनों की भांति वक्त से पहले ही अस्ताचल गामी हो गए होते तो फिर धरा रह जाता बादशाहत बरकरार रखने का सपना।

Wednesday, February 17, 2010

चलो काई तो सोच रहा है दूर की

चन्द्र कान्त शुक्ला

मानव संसाधन मंत्रालय पिछले लम्बे समय से विवादों का पर्याय बन गया था। इस पद को सुशोभित करने वाले सर्वश्री मुरली मनोहर जोशी और श्रीमान अर्जुन सिंह ने सारी ऊर्जा पार्टी का एजेंडा लागू करने में ही लगा दी। दोनों में भगवाकरण और मुस्लिम तुष्टिकरण में एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ ही लगी रही। एक भी उल्लेखनीय कार्य दोनों ही नहीं कर पाए। अब यह देखकर अच्छा लग रहा है कि नए मानव संसाधन मंत्री कुछ तो हाथ-पैर मार रहे हैं। बोर्ड परीक्षाओं पर सराहनीय पहल के बाद प्रवेश परीक्षाओं और एक समान पठ्यक्रम पर उनकी पहल यदि सिरे चढ़ती है तो आने वाली पीढ़ियों का कुछ तो भला होगा ही। यदि सिरे चढ़ती है यहां मैं इसलिए कह रहा हूं कि हमारे देश में कुछ अच्छी योजनाएं महज इसलिए लागू नहीं हो पार्इं क्योंकि अनेक राज्यों में दूसरे राजनीतिक दलों की सरकारें होती हैं और सियासी वजहों से उन्हें केंद्र सरकार की हर नीति का विरोध ही करना होता है।

Tuesday, February 16, 2010

कलाई के जादूगर की बाजीगरी

कलात्मकता और आक्रामकता का अनूठा मिश्रण है लक्ष्मण की बल्लेबाज़ी
चंद्रकांत शुक्ला
मंगलवार को ईडन गार्डन में वीवीएस लक्ष्मण ने कलात्मकता से भरी एक और शानदार पारी खेली। इस समय टेस्ट क्रिकेट में भारत के प्रमुख प्रतिद्वंदी दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ लक्ष्मण के बल्ले से यह शानदार पारी फिर ऐसे समय में निकली, जब टीम को प्रतिष्ठा की लड़ाई में बने रहने के लिए उसकी नितांत आवश्यकता थी। लक्ष्मण की कलात्मक बल्लेबाजी का ही यह कमाल था कि सैकड़ा पूरा होने पर दर्शकों के अलावा दिन भर फील्डिंग करते हुए पसीने से तरबतर अफ्रीकी खिलाड़ी भी तालियां बजाते नजर आए। वर्ना आजकल तो क्रिकेट में ऐसे दृश्य दुर्लभ ही हो गए हैं। लक्ष्मण की इस पारी का महत्व भारतीय ड्रेसिंग रूम के माहौल से भी समझा जा सकता है जहां शतक पूरा होते ही हर खिलाड़ी जोशीले अंदाज में तालियां पीट रहा था। इतना जोश तो भारतीय खेमे में सचिन का शतक पूरा होने पर भी आजकल नहीं दिखता। साथ में बल्लेबाजी कर रहे कप्तान धोनी को ऐसे ही एक मजबूत खम्भे की जरूरत थी जो उनका रन बनाने में भी भरपूर साथ दे सके और लक्ष्मण ने धोनी को निराश नहीं किया। वैसे तो ईडन गार्डन लक्ष्मण को सदा ही रास आता रहा है, किंतु इस पारी के साथ ही उन्होंने एक महत्वपूर्ण रिकार्ड भी अपने नाम कर लिया। लक्ष्मण इस मैदान में एक हजार टेस्ट रन पूरा करने वाले पहले खिलाड़ी बन गए हैं। मैने लक्ष्मण की आस्ट्रेलिया के खिलाफ खेली गई दो सौ इक्यासी रनों की वह ऐतिहासिक पारी भी देखी थी, आज उस पारी के एक-एक शाट्स मेरे जेहन में उभर रहे थे। लक्ष्मण आज भी अपनी बल्लेबाजी में उतने ही तल्लीन थे। उनकी कलाई में आज भी वैसी ही लोच और लचक मौजूद है जिसके दम पर वे दुनिया के बेहतरीन गेंदबाजों के माथे पर पसीने की बंूदें ही नहीं बल्कि धार निकालने का माद्दा रखते हैं। इसी वजह से उनकी शैली को मैं आक्रामकता भरी कलात्मक बल्लेबाजी का नाम देता हंू। बहरहाल इस मैच की बात करें तो पहली पारी में गेदबाजों के अच्छे प्रदर्शन के बाद बल्लेबाजों ने भी अपने दायित्व का निर्वहन बखूबी कर दिया है और मैच जिताने का जिम्मा फिर गेदबाजों के पाले में डाल दिया है।