रोजगार ही नहीं संस्कार भी हो शिक्षा में
विनोद डोंगरे
अप्रैल के खत्म होते ही शिक्षा सत्र भी खत्म हो जाता है। नए शिक्षा सत्र के लिए तैयारियां प्रारंभ हो जाती है। हमेशा की तरह इस वर्ष भी चारों ओर 'शिक्षा प्रतिष्ठानों का जोर-शोर शुरू हो चुका है। छोटे-बड़े विद्यालय हजारों-लाखों की तादाद में अनेक फीचर्स (विशेषताएं) देने की बात कहते हुए बाजार में कुद पड़े हैं। कोई अंग्रेजी बोलने की शिक्षा मुफ्त में देने की बात कर रहा है, तो कोई कंप्यूटर का ज्ञान। कहीं पढ़ाई के साथ रोजगार देने की योजनाएं बताई जा रहीं हैं, तो कहीं पढ़ाई पूरी होते ही रोजगार। हमारा भारतवर्ष वह देश है, जहां किसी समय गुरूकुल पद्धति से शिक्षा दी जाती थी और विद्यार्थी का सर्वंगीर विकास होता था। उसे बौद्धिक रूप से मजबूत बनाने के साथ-साथ नैतिक रूप से भी इतना सबल बना दिया जाता था कि वह बालक बाहरी एवं आंतरिक संकटों का दृढ़ता के साथ सामना कर सकता था, किंतु वर्तमान शिक्षा देश के छात्रों को सही दिशा में नहीं ले जा रही है। वह उनके चरित्र का पूर्ण विकास नहीं कर रही है। वह देश की मिट्टी और संस्कृति से पीछे चली गई है। यह शिक्षा चरित्र का निर्माण नहीं करती, श्रम की प्रतिष्ठा नहीं कर रही है और यह शिक्षा पद्धति देशभक्त पैदा करने में भी असंदिग्ध रूप से असफल रही है। इसी तारतम्य में यह भी ध्यान देने योग्य है कि मध्यप्रदेश में हाईस्कूल का परीक्षा का परिणाम खराब आने के बाद करीब आधा दर्जन छात्र आत्महत्या कर चुके हैं। इस मामले को लेकर राज्य में परिस्थितियां ऐसी बन रही हैं कि सरकार को अपनी नीतियों में परिवर्तन करने का विचार करना पड़ रहा है। ऐसी भी बातें हो रहीं है कि कृपांक ५ से बढ़ाकर २० कर दिए जाने से सवा लाख विद्यार्थी उत्तीर्ण हो सकते हैं। जाहिर है कि कृपांक में वृद्धि छात्रों को किसी तरह परीक्षा में उत्तीर्ण करने का एक उपक्रम मात्र है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या किसी भी तरह से उत्तीर्ण कर देने से समस्या का हल हो जाएगा? वर्तमान शिक्षा पद्धति भारतीय समाज रचना और संस्कृति से मेल नहीं खाती। इसमें असंख्य खामियां हैं। यह सही है कि शिक्षा का रोजगारपरक होना आवश्यक है, लेकिन संस्कार, नैतिकता और राष्ट्रप्रेम की भावना से इतर सिर्फ और सिर्फ धनोपार्जन की ही शिक्षा क्या देश और समाज के हित में हैं॥?दरअसल, वर्तमान शिक्षा पद्धति के जनक लॉर्ड मैकाले ने रक्त और त्वचा से भारतीय किंतु आदर्श, अभिरूचि और मान्यता में यूरोपीय पीढ़ी तैयार करने की दृष्टि से एक ऐसी शिक्षा पद्धति भारतीय समाज पर थोपी जिसके परिणामस्वरूप इस देश के तत्वज्ञान, संस्कृति तथा जीवन आदर्शों से कटी पीढ़ी का निर्माण होता जा रहा है। वह पीढ़ी सिर्फ और सिर्फ शिक्षा के माध्यम से अधिकाधिक धनोपार्जन करने की जुगाड़ में लगी रहती है। इस तथ्य की पुष्टि के लिए निजी क्षेत्र के ज्यादातर विद्यालयों की वस्तुस्थिति से अवगत हुआ जा सकता है। ज्ञात सत्य है कि कस्बाई इलाकों में संचालित होने में वाले अधिकांश शैक्षणिक संस्थानों में बतौर शिक्षक या प्राध्यापक ऐसे उम्मीदवारों की नियुक्ति की जाती है, जो स्वयं कहीं दूसरी जगह अध्ययनरत होते हैं। उनमें से अधिसंख्य ऐसे होते हैं, जो अपनी आर्थिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए वहां पार्ट टाइम जॉब कर रहे होते हैं। यानि, उनकी रूचि न तो शिक्षण में होती है, न ही वे इसके जानकार होते हैं। हद तो यह कि कई स्थानों पर मात्र हायर सेकंडरी स्कूल तक की पढ़ाई किए या कर रहे छात्रों को भी अध्यापन जैसे कार्य के लिए रखे जाने के उदाहरण मिलते हैं। अध्यापन कोई मामूली कार्य नहीं है। वह बेहद गंभीर और अनुभवपूर्ण दायित्व है। शिक्षकों को समाज के निर्माता की संज्ञा यूं ही नहीं दिया गया है। गुरू गोबन्द दोऊ खड़े...जैसे श्लोक यूं नहीं बने हैं। लेकिन जो स्वयं अध्ययन कर रहे हों, उनके पास अध्यापन का गंभीर और दूरदर्शी अनुभव की कल्पना उचित नहीं है। हालांकि इनमें से ऐसे भी होते हैं, जिनकी अध्यापन शैली बेहतर होती है। लेकिन वैसे बिरले ही पाए जाते हैं। एक संस्थान में नियुक्त सारे पार्ट टाइम अध्यापक ऐसे नहीं हो सकते। जबकि होना सभी को चाहिए। जब विद्यालयों के अध्यापक ही स्तरीय न हों, तो अध्यापन में स्तर कहां से होगा। विद्यालय प्रबंधन इसलिए ऐसे कथित अध्यापकों की औन-पौन वेतन में नियुक्ति कर लेते हैं, क्योंकि उनकी न तो वेतन को लेकर कोई शर्तें होतीं हैं, न ही कोई अन्य सुविधाओं को लेकर। इधर, छात्रों से भारी-भरकम शुल्क लेकर बेहतर शिक्षा का दावा करने वाले ऐसे 'शैक्षणिक प्रतिष्ठानों के लिए भी यह लाभप्रद होता है क्योंकि उनका तो ध्येय ही धनोपार्जन होता है, न कि बेहतर शिक्षा देना। मध्यप्रदेश में छात्रों के आत्महत्या करने के मामलों ने शिक्षा की सरकारी व्यवस्था की ओर भी ध्यान खींचा है। और, आत्महत्या भले मध्यप्रदेश में हुए हों, पर शिक्षा के मौजूदा हालात देश के कई दूसरे प्रदेशों में भी ऐसे ही हैं। उड़ीसा, झारखण्ड, उत्तराखंड और कुछ हद तक छत्तीसगढ़ जैसे देश के राज्य इनमें शामिल हैं। बेहतर शैक्षणिक वातावरण की कमी कि इसके पीछे प्रमुख कारण यह है कि जिनकी स्वयं की शिक्षा गुणवत्तापूर्ण होती है, ऐसे लोग अध्यापन के क्षेत्र नहीं आना चाहते हैं। वे अध्यापन के क्षेत्र में इसलिए नहीं आना चाहते, क्योंकि दूसरे क्षेत्रों की बनिस्पत इसमें पैकेज नहीं है। यानि, इस क्षेत्र में आने वाले ज्यादातर लोग ऐसे होते हैं, बाकी क्षेत्रों में भाग्य आजमाने के बाद असफल होने पर बीएड, एमएड आदि का सहारा लेते हुए शिक्षा के क्षेत्र में घुस जाते हैं। उनका उद्येश्य विशुद्ध रूप से नौकरी करना ही होता है। स्वावभाविक तौर पर उनकी मन में यह भावना भी रहती होगी वे ऐसी नौकरी कर रहे हैं, जहां वेतन दूसरे सेक्टर की अपेक्षा कम है। कहने का मतलब, सरकार को शिक्षा के स्तर को बेहतर बनाने के लिए बाकी चीजों के साथ-साथ वेतन व दूसरी सुविधाओं पर भी ध्यान देना होगा। बेहतर समाज की परिकल्पना में पहली आवश्यकता बेहतर शिक्षा की है। शिक्षा ऐसी हो जिसमें नैतिकता, संस्कार, साहस और राष्ट्रप्रेम की भावना समाहित हो। क्योंकि, किताबी ज्ञान से विद्यार्थी उपाधियां तो प्राप्त कर सकता है किंतु समाज के उत्तरदायित्वों को पूरी करने की क्षमता का विकास उसमें नहीं हो पाता है। आज भारत युवाओं का देश है। यहां २५ वर्ष उम्र के सर्वाधिक युवा हैं। ३५ प्रतिशत आबादी १४ वर्ष उम्र की है। ५५ प्रतिशत आबादी काम करने वालों की है। इतनी युवा और श्रम शक्ति होने के बावजूद हम इतने दुर्बल क्यों है॥? हम संकटों से सामना करने की बजाय उससे दूर क्यों भाग रहे हैं..? हममें सम्राट चंद्रगुप्त, आर्यश्रेष्ठ चाणक्य की संकल्पशक्ति का लोप क्यों हो गया है..? हम क्यों भूल गए कि किसी समय हमारा देश ज्ञान-विज्ञान का प्रमुख केंद्र था। यह वही भारत देश है, जहां नालंदा, तक्षशिला एवं हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय जैसे शिक्षा के उच्चस्तरीय केंद्र थे, जहां कभी लगभग ५ दर्जन विषयों की शिक्षा दी जाती थी एवं विश्व भर के हजारों विद्यार्थी यहां पढऩे आते थे। जान-बूझकर एक षडयंत्र के तहत हमें यह सब भुला दिया गया है। हमें भुला दिए गए हमारे आदर्श, हमें आज याद नहीं हमारे प्रेरणा पुंज। भक्त प्रह्लाद से शिक्षा लेने वाला बालक क्या कभी आत्महत्या करने की सोच सकता है॥? सूरज को मुंह में समा लेने वाले बाल हनुमान का स्मरण विद्यार्थी को हो जाने पर क्या वह संकट के सामने नतमस्तक हो सकता है..? सिंह से लडऩे एवं शेरनी का दूध निकाल लेने वाले शिवा के शिवाजी बनने का पाठ यदि पाठ्यपुस्तकों में होता तो फिर इतनी कमजोर पीढ़ी हमारे सामने नहीं होती। हमारे यहां प्राचीन समय से विद्यार्थी, शिक्षक एवं शिक्षास्थल एक अनुशासित समुह के रूप में काम करते आए हैं, किंतु आज शिक्षास्थल पूर्णत: व्यावसायिक, विद्यार्थी स्वार्थी और शिक्षक किताबी ज्ञान देने वाले मास्टर हो गए हैं। संसार में प्रत्येक प्राणी जन्म लेता है और कुछ काल बाद मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। मृत्यु का पांव कब उसे कुचल दे, कोई नहीं जान सकता। मनुष्य जीवन ईश्वर का एक अनुपम उपहार है। मनुष्य को ही परमात्मा ने यह क्षमता प्रदान की है कि वह मृत्यु को भी परे ढकेल कर अमृत्व को प्राप्त करें। इतिहास और श्रे ष्ठ पुरुषों का अध्ययन करने से यह स्पष्ट होता है कि व्यक्ति की उन्नति के लिए कुछ गुण अत्यावश्यक हैं। वे गुण ही मानवता की कसौटियां है। जिसके पास ऐसे गुण जितने होंगे, वह व्यक्ति उतना ही श्रे ष्ठ होगा।

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