बिजली सबसे सस्ती छत्तीसगढ़ मेंचंद्रकांत शुक्ला, रायपुर
टेंसन व्यवस्था के बिगाड़ने वालों को, टेंसन समाज के सौदागरों को, टेंसन समाज को बांटने वालों को,जोरदार टेंसन..........उन सभी दुराचारियों को जो लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते हुए अपना उल्लू सीधा करते हैं.
बिजली सबसे सस्ती छत्तीसगढ़ में
साठ साल की आज़ादी और शर्म
चंद्रकांत शुक्ला, रायपुर.
सुखराम डोगरा तब चौदह बरस के थे जब “आधुनिक भारत का पहला मंदिर” बनाने के लिए उनके कांगड़ा स्थित गांव में जवाहरलाल नेहरू पहुंचे थे। गहरे कोटरों में से झांकतीं बरसों से प्रतीक्षारत सुखराम की आंखें याद करती हैं, “ तब हमें कहा गया था कि इस बांध से बिजली मिलेगी, समृद्धि आएगी. हम लोगों ने खुशी-खुशी देश के नाम पर अपना सब कुछ त्याग दिया. हालांकि, मन में कहीं एक बात थी कि पानी नहीं आएगा और सब बच जाएगा.”अजमेर सिंह, सुखराम डोगरा और उनके विस्थापित साथी
सतलुज का पानी आया. हहराते हुए आया और साठ किलोमीटर के दायरे में सब बहा ले गया. पंजाब की सीमा से लगे हिमाचल के बिलासपुर और उसके आसपास बसने वालों का भरोसा न राजा पर रहा, न ही सतलुज पर. दुनिया का दूसरा सबसे ऊंचा बांध भाखड़ा बन कर तैयार हो चुका था. 446 गांव डूब गए, हजार साल पुराना नरसिंह भगवान का मंदिर भी. सुखराम की साढ़े पांच एकड़ खेती की जमीन भी जा चुकी थी. इसके बदले उन्हें आज तक कुछ नहीं मिला. छह दशक बाद आज भी सुखराम जैसे भाखड़ा बांध प्रभावित कई बचे-खुचे बूढ़े कानूनी लड़ाई में लगे हुए हैं. वे बार-बार हरियाणा के हिसार, सिरसा और फतेहाबाद से चल कर उन तमाम जगहों पर पहुंचते हैं, जहां उन्हें उम्मीद होती है कि शायद हिमालय क्षेत्र में बने बांधों के विस्थापितों का कोई तो आंदोलन खड़ा हो. 1948 में भाखड़ा बांध का काम शुरु हुआ और 1963 में बन कर तैयार हुआ था. इसमें जो गांव डूबे, उनमें तत्कालीन कांगड़ा की कुटलहड़ रियासत के 100 से ज्यादा, बिलासपुर रियासत के 256 और मंडी के 5 गांव भी थे. 1956 में विस्थापितों को जमीन तो दे दी गई, लेकिन मालिकाना अधिकार 1984 में ही मिल सका. यह भी सभी को नसीब नहीं हुआ. आज की तारीख में 1867 प्लॉट पर विस्थापितों को मालिकाना दिया जाना बाकी है, जबकि कुल 2836 प्लॉट आवंटित किए गए थे. बिलासपुर में ही जनरल स्टोर चलाने वाले बुजुर्ग गुप्ता जी पूछते हैं कि यह कहां का इंसाफ है. वह कहते हैं,
“ उस वक्त तो लोग इतने जागरूक भी नहीं थे, लेकिन आज 60 बरस हो गए लड़ते हुए, अब
कहां जाएं.”
उनकी दुकान से नीचे दिखाई देती है सतलुज की वह पतली रेखा और उसका विस्तृत दियारा, जो पुरानी बिलासपुर रियासत की कब्रगाह है. वे बताते हैं कि आजादी के वक्त यह सारा इलाका पंजाब में आता था और बिलासपुर की अपनी स्वतंत्र रियासत थी. बिलासपुर के राजा अनंत चंद ने भाखड़ा के लिए जमीन अधिग्रहण का जो समझौता किया, वह सीधे भारत सरकार के साथ था. बाद में बिलासपुर को हिमाचल में शामिल कर लिया गया, जब हिमाचल बना. लेकिन मूल समझौते में आज तक कोई संशोधन नहीं हुआ, जिसमें पुनर्वास और पुनर्स्थापन को लेकर कोई ठोस प्रावधान नहीं था. भाखड़ा के विस्थापितों पर नर्मदा बचाओ आंदोलन के श्रीपाद धर्माधिकारी ने एक विस्तृत किताब लिखी है. हिमाचल के एक स्थानीय नेता गुमान सिंह कहते हैं कि यह किताब भी विश्वसनीय नहीं. गुमान कहते हैं,
“ सरकार के पास मूल समझौते के कागजात ही नहीं हैं. बात इतनी पुरानी हो चुकी कि जो
भी इस मसले पर काम करना चाहता है, वह बिलासपुर का गजट उठा लेता है. इस पुस्तक में
भी गजट से जानकारी ली गई है, लेकिन वास्तविक स्थिति कहीं ज्यादा भयावह है.”
पचास साल पुराने इस असंतोष का एक और चेहरा दिखता है, जब हम बिलासपुर शहर में होटल चलाने वाले एक रईस सांख्यायन जी से मिलते हैं. इनके पिता कांग्रेस के बड़े नेता हुआ करते थे. आज करोड़ों की सम्पत्ति रखने वाले सांख्यायन को यह चिंता सताती है कि पहाड़ों में लगने वाली टावर लाइन से उनकी खेती प्रभावित हो रही है. वह भी अपनी कहानी विस्थापन तक ही ले जाते हैं, हालांकि बिलासपुर में ऐसे विस्थापितों की कमी नहीं जिन्हें नए बिलासपुर ने कहीं ज्यादा दिया है. आज बिलासपुर जिस जमीन पर बसा है वह 99 साल की लीज पर है. यहां सभी इस बात को जानते हैं. गुप्ता जी कहते हैं, “ उधार की जिंदगी जी रहे हैं हम लोग. हम तो फिर भी जानते हैं, नई पीढ़ी शायद ही इस बात को याद रखे कि उसका घर, दुकान और समूची जिंदगी लीज पर है. पहले दर्द था, लेकिन जानकारी नहीं थी. आज दर्द ही गायब हो रहा है, लड़के भले पढ़-लिख रहे हों.”यह सही है कि हिमाचल के अधिकतर शहरों में पढ़े-लिखे लोग पर्याप्त मिल जाते हैं. लेकिन, इसका दूसरा पहलू भाखड़ा बांध विस्थापितों के मुंह से सुन कर हैरानी होती है. भारतीय सेना की डोगरा रेजीमेंट में कभी कांगड़ा से लेकर भाखड़ा तक डोगरा श्रेणी के लोगों को भर्ती किया जाता था और उन्हें तरजीह दी जाती थी. राजा विजयचंद ने डोगराओं की भर्ती सेना में शुरू करवाई थी.
अजंता-एलोरा की तर्ज पर बने एक मंदिर का गुंबद. इसे चंदेल वंश के राजाओं ने बनवाया था.
हुआ यह कि भाखड़ा बनने के बाद डोगरा श्रेणी के लोगों को हिसार, सिरसा और फतेहाबाद में बसा दिया गया. हरियाणा सरकार ने आज तक इन्हें डोगरा श्रेणी के चलते सेना में भर्ती होने की रियायत नहीं दी. जब मांग उठाई गई, तो हरियाणा सरकार ने ऐसा करने के लिए हिमाचल सरकार को चिट्ठी लिखी. हिमाचल के अतिरिक्त सचिव द्वारा सुखराम डोगरा के नाम चिट्ठी आई कि बिलासपुर और ऊना जिले के उपायुक्तों को हरियाणा में बसे भाखड़ा के विस्थापितों के जवान लड़कों को डोगरा प्रमाण-पत्र जारी करने के अधिकार दे दिए गए हैं. इस संदर्भ में 1 फरवरी, 2008 को किए गए पत्राचार की प्रति का हवाला दिया गया.सुखराम कहते हैं, “ ये भी भला कोई बात हुई. रहते हम हरियाणा में हैं और प्रमाण-पत्र देगा हिमाचल का प्रशासन. अधिकारी अपनी मनमर्जी करते हैं, हम कहते कुछ और हैं और वे समझते कुछ और हैं.”इन्हीं विस्थापितों में एक ठाकुर अजमेर सिंह बिल्कुल सही कारण पर चोट करते हैं. “ असल दिक्कत यह है कि हमारे पास कोई राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं है. कोई सांसद नहीं, कोई विधायक नहीं. हमारी बात सुनने वाला और उसे उठाने वाला कोई नहीं है.” हरियाणा में जो विस्थापित बसे हैं, उनके लड़कों में अब तक एक डॉक्टर, एक इंजीनियर, एक आईएएस नहीं बना. अजमेर सिंह बताते हैं कि उनकी जानकारी में 40 हजार लोगों में चुनिंदा एक या दो लड़के हैं, जो कहीं अकाउंटेंट का काम कर रहे हैं. आज भी हमारे स्कूली बच्चे किताबों में भाखड़ा बांध की गौरवमयी कहानियां पढ़ते हैं. लेकिन, डूबे हुए बिलासपुर के विशालकाय मंदिरों के गुंबद अब भी सतलुज किनारे 60 साल की नाइंसाफी और बेशर्मी की गवाही देते खड़े हैं. कहते हैं कि जब टिहरी डूब रहा था, तो गवाह के तौर पर अंत तक घंटाघर खड़ा रहा. फिर उसने भी जल समाधि ले ली. शायद ठीक ही किया क्योंकि आज सरकार बिलासपुर के इन बरसों पुराने मंदिरों के गुंबदों को उखाड़ने वाली है. इन्हें जस का तस उठा कर शहर में एक म्यूजियम में रखा जाएगा. आने वाली पीढ़ियां तब जो पढ़ेंगी, वही देखेंगी. टिहरी का सौभाग्य है कि वहां इतिहास का कोई कतरा नहीं बचा. बिलासपुर अब भी जिंदा है.

आंध्र प्रदेश में महिला गृहमंत्री
चंद्रकांत शुक्ला, रायपुरआंध्र प्रदेश की पहली महिला गृह की पहली महिला गृह मंत्री बन कर सबिता इंदिरा रेड्डी ने इतिहास रचा है.
मंगलवार को आंध्र प्रदेश में नई सरकार के मंत्रियों के विभाग के बंटबारे के समय सबिता रेड्डी को यह महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया.
पिछले कार्यकाल के दौरान सबिता रेड्डी आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी के कैबिनेट में खनन मंत्री रही थी.
वर्ष 1994-95 में आंध्र प्रदेश में एनटी रामा राव के कैबिनट में सबिता के दिवंगत पति इंदिरा रेड्डी गृह मंत्री थे.
सबिता रेड्डी इस बार माहेश्वरम सीट से चुनाव जीत कर विधान सभा में आई हैं.
वाईएसआर राजशेखर रेड्डी के नेतृत्व में पिछली सरकार के दौरान केजना रेड्डी गृहमंत्री थे लेकिन इस बार उन्हें कोई पद नहीं दिया गया।
वाईएसआर रेड्डी के कैबिनट में इस बार सबिता रेड्डी समेत छह महिला मंत्रियों को लिया गया है. इनमें से पाँच तेलंगाना इलाक़े से हैं.
डॉक्टर जे गीता रेड्डी को इस बार सूचना एवं जन संपर्क मंत्री बनाया गया है.
सबिता रेड्डी ने गृह मंत्री का पद मिलने के बाद प्रतिक्रिया देते हुए कहा, " मुख्यमंत्री ने महिलाओं की क्षमता और किसी भी क्षेत्र में उनके प्रदर्शन की ताक़त को पहचाना है."
उनका कहना था, "मेरे लिए यह गर्व की बात है कि मुझे वह विभाग और पद दिया गया है जिसे मेरे पति पहले संभाल चुके हैं."
एक सवाल के जवाब में सबिता रेड्डी का कहना था कि राज्य में चरमपंथ की समस्या से निपटने के लिए वह कठोर क़दम उठाएगी.
किसी महिला को गृहमंत्री बनाने के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी के क़दम का स्वागत करते हुए तेलगू देशम पार्टी की महिला इकाई की प्रमुख और फ़िल्म अभिनेत्री रोजा ने बताया, " मुझे उम्मीद है कि महिलाओं पर बढ़ रहे अत्याचार के ख़िलाफ़ गृहमंत्री ज़रुरी क़दम उठाएंगी."